गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
कई वर्षों पहले मैं "हृद्ययुक्त पथ" इस शब्द से परिचित हुआ, कुछ किताबो द्वारा [१०]। सबकुछ समझ में नहीं आया , कुछ सर के ऊपर से भी गया, वह इतना गूढ़ प्रतीत हुआ। जो भी हो, वो शब्द मुझ पर छाप छोड़ गए, और बाद में यह स्पष्ट हुआ वो क्या कहते थे. वो ऐसा कुछ था जिसकी मुझे तलाश थी। मैंने इस संकल्पना को " हृदयपथ " इस रूप में फिर अपना लिया है [१]। यह रूप कुछ अधिक स्पष्ट है किन्तु कम पद्यात्मक है, और अब हम चर्चा करेंगे कि ये है क्या और क्यों इतना महत्वपूर्ण है।
यह मेरा अनुभव रहा है कि, अधिकांश व्यक्ति चिन्तनहीन जीवन व्यतीत करते हैं, अर्द्धसुप्त , अनभिज्ञ, लगभग अजीवित, प्रेतवत। उनका जीवन बाध्यताओं की एक श्रृंखला मात्र है [२], जो उनकी स्वयं की इच्छाओं, वासनाओं, भय, भावनाओं, सामाजिक दबाव, शारीरिक ज़रूरतों, पसंद, नापसंद, इत्यादि कई कारणों से अधिरोपित है। उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा अस्तित्व संबंधी गतिविधियों से बना होता है - भोजन, जनन, संबंध, सुरक्षा, समाजिक स्तरादि।
