ज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

ज्ञानमार्ग की दीक्षा

ज्ञानमार्ग कार्यक्रम

नमस्ते,

दीक्षा का अर्थ है आरम्भ। निम्नलिखित कार्यक्रम उन साधकों के लिए है जो इस मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए एक व्यवस्थित विधि चाहते हैं। इस कार्यक्रम पर चलने का सुझाव दिया जा रहा है। यह पूर्णतया निशुल्क है। इसकी कोई निश्चित समयावधि नहीं है , अपनी गति और योग्यता के अनुसार चलें। 

मैं केवल मार्गदर्शन कर सकता हूँ, कोई चमत्कार नहीं होंगे। आपकी प्रगति आप पर ही निर्भर है , वीडियो और सत्संग में केवल प्रचलित ज्ञान है , कुछ विशेष नहीं। 

कोई अनुष्ठान नहीं, कोई देवता नहीं, कोई पूजा नहीं, कोई आसन नहीं, किसी भी प्रकार की शक्ति से नहीं खेलना है, कोई विशेष आहार नहीं, कोई ब्रह्मचर्य नहीं, कहीं भी यात्रा करने की आवश्यकता नहीं। सिर्फ शुद्ध ज्ञान, प्रमाण सहित, कोई उपदेश नहीं - सत्य आपके सामने है।

ज्ञानमार्ग पर शास्त्रोक्त विधि है : श्रवण, मनन, निदिध्यासन। 

ज्ञान साधना के ये तीन भाग हैं । प्रवचनों को सुनकर, उनके  सत्य को देखने के लिए मनन करना और सत्य का पालन करना, वह सब छोड़ देना जो असत्य और अनावश्यक है। तो चलिए शुरू करते हैं। 

This program is also available in English.

सोमवार, 2 जनवरी 2017

चित्त एक अनोखा वरदान : भाग - १



अनुभवक्रिया में रत अस्तित्व आधारभूत प्रक्रिया से बंध जाता है जिसका परिणाम अनुभवों का आत्मसंगठन है, जिसे हम ज्ञान कहते हैं।  आधारभूत प्रक्रिया की यह गतिविधि विभिन्न रूपों में दिखती है, जैसे एक बहती नदी धरा को विभिन्न रूपों में तराशती है।  यदि हम इस आत्मसंगठन की गतिविधियों का एक जगह संकलन कर दें तो यह एक विराट वस्तु का रूप ले लेतीं है।  इससे हम पहले ही चित्त के नाम से परिचित हो चुके हैं।  यह स्वभक्षी है , अपने विस्तार के सीधे अनुपात में बढ़ता जाता है , और अधिक संगठन , संरचना , अर्थ और गतिविधि रचता जाता है।  यह आवश्यकताजनित है , क्योंकि कोई चीज़ ऐसा ना करे तो वह संरचनाओं के रूप में अनुभव नहीं की जा सकती , नश्वरता के प्रभाव से वो तुरंत विलीन हो जाती है।  यदि आप चकित हैं कि उपरोक्त का क्या अर्थ है , तो शायद आप कहीं बीच में पढ़ना शुरू कर रहें हैं , तो कृपया पिछले लेख पढ़ लें, इन वाक्यों का अर्थ समझने के लिए।

चित्त की यह आत्मनिर्भर महासंरचना सच में एक अनोखी और असाधारण चीज़ है।  मुझे लगता है कि अस्तित्व को इस पर बड़ा गर्व है , यह उसकी प्रिय संतान है।  यह प्रेम इतना गहरा है कि , स्व के रूप में अस्तित्व स्वयं को चित्त मान बैठता है।  बहुत अच्छा लगता है लेकिन तब तक , जब तक दुःख नहीं शुरू होता।  माँ-बेटे के इस प्रेम में ये दुःख बीच में कहाँ से आ गया? क्या चित्त में कोई बना बनाया दुःख को जनने वाला यन्त्र है? क्या आधारभूत प्रक्रिया ने इस त्रुटि को एक विशेषता कहकर छोड़ दिया है ;-)?

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

अस्तित्व, अनुभव तथा ज्ञान

साल्वाडोर डाली द्वारा

अनुभव रूपी अस्तित्व 

एक बात बहुत निश्चित है - अस्तित्व है।  वास्तव में केवल यही मेरे लिए निश्चित है।  मुझे और कोई ज्ञान नहीं है , और कोई ऐसा अनुभव नहीं है जो इतना निश्चित लगता हो।  बस कुछ है।  उस "कुछ" को में अस्तित्व इस शब्द से परिभाषित करता हूँ।  ये बस एक शब्द है जो उस निश्चितता का सूचक है।  अस्तित्व एक प्रक्रिया द्वारा गतिमान हो रहा है , उसे मैं अनुभवक्रिया कहूंगा, और फिर अनुभव यह शब्द इस प्रक्रिया का संज्ञा रूप है।  मैं कितना भी प्रयास करूँ , मैं इसका खंडन नहीं कर सकता , नकार नहीं सकता , और कोई भी ऎसा नहीं कर पायेगा। तो हम यहाँ एक बहुत दृढ़ आधार पर हैं। यह एक अच्छी शुरुआत है , शायद यहीं से कोई भी शुरुआत हो सकती है।

अस्तित्वनाद या अस्तित्व के परिवर्तन अनुभवक्रिया को जन्म देते हैं।  बस इतना ही कुछ है , बाकि सब कुछ विवरण मात्र है।  मुझसे मत पूछिये के ये अस्तित्व क्या चीज़ है, और उसमे ये नाद परिवर्तनादि हो क्यों रहा है , कैसे यह सब हो रहा है और क्यों ..... मुझे कोई ज्ञान नहीं इसका।  महान ऋषि और पंडित इस बारे में क्या कहते हैं ये जानने के लिए तत्वविज्ञान की कोई अच्छी किताब पढ़ लें।  मैं आपको आश्वासन देता हूँ की ये कोई नहीं जानता।